Friday, August 31, 2012

ये दुनियां चोर लुटेरों की
मक्कारों की होशियारों की

मेहनतकश की जिंदगी
बन गयी कठिन डगर अंगारों की

जिंदगी एक खिलौना बन गयी
चांदी हुई साहूकारों की

भागमभाग मची है हरसू
चारो ओर अंधियारा है

गैरों का हक   मार मार के
जेब भरी ठेकेदारों की

अन्नाजी तो बोल रहे है
आओ कुछ अच्छा काम करें

लेकिन किसी ने सुध न  ली
इन गूंगी  बहरी सरकारों ने

अब सोये तो सो जाओगे
आओ मिलकर रक्षा करें
हम अपनी अधिकारों की

Saturday, March 12, 2011

रूबरू


मेरे दिल में क्या है जरा सुन तो लीजिये
इक बार ही सही अब जरा मौका तो दीजिये

रूबरू न सही ख्यालों में मिल तो लीजिये
कुछ और न सही जरा ये करम तो कीजिये

फूल खिल जायेंगे हर सू इस वीराने में भी
निगाहों से ही सही जरा जहमत  तो कीजिये

कुछ कहिये और कुछ मेरी सुन तो लीजिये
गिले सिक्वों के लिए  जरा मुआफी  तो दीजिये

नशा सराब से कम इन आँखों में तो नहीं
कुछ मुझको पिलाईये  कुछ खुद तो पीजिये




Sunday, January 30, 2011

दरवाज़ा खुला हुआ है


ठोकर लगे तो आना दरवाज़ा खुला हुआ है
आकर फिर न जाना दिल रौशन किया हुआ है

जालिम है यह ज़माना और तुम हो बेखबर
रास्ता बड़ा कठिन है पहरा लगा हुआ है

दिल तेरा कोई दुखाये तो मुझको याद करना
छुपाने को दिल में एक कोना  बचा हुआ है

तेरी नासमझी ने ही मुझको बड़ा रुलाया
आंसू से मेरा दामन अबभी भरा हुआ है

तेरे खोने का गम तो है ही पर कभी
कोई जालिम न सताए डर इसका बना हुआ है 

सितमगर


सितम पे सितम वो किये जा रहे हैं
चुपके से सितम हम सहे जा रहे हैं

कभी तो ख़तम होंगे सितम सारे उनके
यही सोंच के अश्क पिए जा रहे हैं

दिल ही दिल में ग़मों को छुपाये हुए
गम नए दिल पे हम लिए जा रहे हैं

फूल न मिल सके तो न ही सही
ग़मों से ही दामन हम भरे जा  रहे है

काँटों भरे दामन में फूल खिलेंगे कभी
इसी एक उम्मीद पे हम जिए जा रहे हैं

ख्वाबों में ही सही मिल रहे हैं वो मुझसे
हौसला मिलन का वो दिए जा रहे हैं

सिक्वे हम करेंगे कभी तो सितमगर से
के चिरागों को रौशन हम किये जा रहे है 

अजनबी


इस शहर में हर सख्स अजीब लगता है
बेगाने तो हैं गैर अपना अजीब लगता है

दिल के करीब रहकर वो रहते है दूर दूर
उनकी बेरुखी ही अब अपना नसीब लगता है

गैरों का क्या कहिये अपनों ने किया छल
वोह सितमगर क्यों अपना हबीब  लगता है

उसके लबों पे नाम मेरा आता है बार बार 
पर उसका इनकार करना कितना अजीब लगता है 


 

न शिकवे न शिकायत

जान हथेली पे


इससे पहले की तू मेरी हकीकत समझे
बह जाने दे सारा लहू दम निकलने के लिए

हो जाए मेरी  जान फ़ना अब  इस घडी
रुक जाने दे सफ़र में अब संभलने के लिए 

हो चुकी सायेद तेरी दास्ताँ अब ख़तम 
कह लेने दे अब मेरे दिल को बहलने के लिए 

मिट चुकी सारी काएनात से खुशियाँ मेरी 
रूह को ही साथ हो लेने दो , दो घडी के लिए

वसल-ए-यार तो ख्वाब बन के रह गया 
रूह से रूह मिलने दो रात ढलने के लिए 

कहते है मुहब्बत पाने का ही नहीं नाम सिर्फ 
जान हाजिर है तुम पे कुर्बान होने के लिए